इस पंचायत के सभी लोग, सभी त्यौहार को खुशियों और पूरी उल्लास के साथ मानते है। जैसे- छट, दिवाली, होली, ईद और दुर्गा पूजा। लेकिन दुर्गा पूजा यहाँ के लोग धूम-धाम से मानते है। सभी समुदाय के छोटे-बड़े, बच्चें तो काफी खुश रहते है, नये-नये कपडे पहनते है, दुर्गा पूजा के स्थान पर एक बड़ी-सी मेला होता है जिसमे छोटे-छोटे दुकान खुल जाता है। राम झोला, मोत के कुआँ जिसके अंदर में खिलाडी मोटरसाइकिल या साइकिल से चारो तरफ गोलाकार गति के साथ चलते है। सचमुच ये खेल बहुत खतरनाक है। यहाँ के बच्चें को खेलने के लिए बहुत सारे खिलोने मिल जाते है और ये सब देखकर बहुत खुश होते है। ये अपने माता-पिता, दादा, चाचा-चाची आगे पीछे करते रहते है। जहाँ से इसको खेलोने खरीदने के लिए पैसे मिल सके। हर रोज एक नया खिलौना होना चाहिए क्योंकि उस समय पूजा स्थान के समीप काफी उल्लास का माहोल रहता है, जहाँ समाज के सारे लोग इकठ्ठा होते है और एक दुसरे से मिलते है, हंसी-मजाक होता है। १० उस दुकान के पास है तो ५ पान के दुकान के पास है। महिला भी सज-धज कर रंगीन साड़ी और कपडे पहनकर कोई कान में पहने वाली बाली तो कोई हाथ में पहने वाली कंगन या कोई सजने-सवरने का सामान खरीद रही है।
दुर्गा पूजा के कमिटी के तरफ से सांस्कृतिक कार्यक्रम का व्यवस्था होता है। जिसको रत में ९ से ४ बजे तक चलता रहता है, जिसमे नाच-गान, जागरण या ओर्केस्ट्रा का आयोजन करवाया जाता है। दस दिनों तक लगातार समाज के सभी लोग दुर्गा पूजा का आनंद उठाते है। दसवें दिन में दुर्गा माता को बड़े उल्लास के साथ बगल के एक बड़े पोखरे में विसर्जीत कर दिया जाता है, जहाँ लगभग पंचायत के सभी लोग भी उपस्थित होते है। अंतिम प्रसाद लेकर अपने-अपने घर की ओर चले जाते है और अगले वर्ष का इंतजार करते है।
दुर्गा पूजा के कमिटी के तरफ से सांस्कृतिक कार्यक्रम का व्यवस्था होता है। जिसको रत में ९ से ४ बजे तक चलता रहता है, जिसमे नाच-गान, जागरण या ओर्केस्ट्रा का आयोजन करवाया जाता है। दस दिनों तक लगातार समाज के सभी लोग दुर्गा पूजा का आनंद उठाते है। दसवें दिन में दुर्गा माता को बड़े उल्लास के साथ बगल के एक बड़े पोखरे में विसर्जीत कर दिया जाता है, जहाँ लगभग पंचायत के सभी लोग भी उपस्थित होते है। अंतिम प्रसाद लेकर अपने-अपने घर की ओर चले जाते है और अगले वर्ष का इंतजार करते है।